इरफ़ान सिद्दीक़ी शायरी – रूप की धूप कहाँ जाती

रूप की धूप कहाँ जाती है मालूम नहीं
शाम किस तरह उतर आती है रुख़्सारों पर – इरफ़ान सिद्दीक़ी