क़ाबिल अजमेरी शायरी – ऐ दौलत-ए-सुकूँ के तलब-गार देखना

ऐ दौलत-ए-सुकूँ के तलब-गार देखना
शबनम से जल गया है गुलिस्ताँ कभी कभी – क़ाबिल अजमेरी