क़ाबिल अजमेरी शायरी – रंग-ए-महफ़िल चाहता है इक मुकम्मल

रंग-ए-महफ़िल चाहता है इक मुकम्मल इंक़लाब
चंद शम्ओं के भड़कने से सहर होती नहीं – क़ाबिल अजमेरी