ख़ुमार बाराबंकवी शायरी – कहने को ज़िन्दगी थी बहुत

कहने को ज़िन्दगी थी बहुत मुख़्तसर मगर
कुछ यूँ बसर हुई कि ख़ुदा याद आ गया

मुझ को शिकस्त-ए-दिल का मज़ा याद आ गया
तुम क्यों उदास हो गए क्या याद आ गया – ख़ुमार बाराबंकवी