ख़ुमार बाराबंकवी शायरी – ये कैसी हवा-ए-तरक्की चली है

ये कैसी हवा-ए-तरक्की चली है
दीये तो दीये दिल बुझे जा रहे हैं – ख़ुमार बाराबंकवी