ख़ुमार बाराबंकवी शायरी – हम रहे मुब्तला-ऐ-दैर-ओ-हरम

हम रहे मुब्तला-ऐ-दैर-ओ-हरम
वो दबे पाँव दिल में आ बैठे

उठ के इक बेवफ़ा ने दे दी जान
रह गए सारे बावफ़ा बैठे – ख़ुमार बाराबंकवी