जिगर मुरादाबादी शायरी – मेरी निगाह-ए-शौक़ भी कुछ कम

मेरी निगाह-ए-शौक़ भी कुछ कम नहीं मगर
फिर भी तिरा शबाब तिरा ही शबाब है! – जिगर मुरादाबादी