दुष्यंत कुमार शायरी – मैं बेपनाह अँधेरों को सुब्ह

मैं बेपनाह अँधेरों को सुब्ह कैसे कहूँ
मैं इन नज़ारों का अँधा तमाशबीन नहीं – दुष्यंत कुमार