परवीन शाकिर शायरी – रफ़ाक़तों के नए ख़्वाब ख़ुशनुमा

रफ़ाक़तों के नए ख़्वाब ख़ुशनुमा हैं मगर
गुज़र चुका है तिरे ए’तिबार का मौसम – परवीन शाकिर