फिराक गोरखपुरी शायरी – रुकी रुकी सी शब-ए-मर्ग ख़त्म

रुकी रुकी सी शब-ए-मर्ग ख़त्म पर आई
वोह पौ फटी, वोह नयी ज़िंदगी नज़र आई – फिराक गोरखपुरी