बशीर बद्र शायरी – न ग़मों का मेरे हिसाब

न ग़मों का मेरे हिसाब ले
न ग़मों का अपने हिसाब दे
वो अजीब रात थी क्या कहें
जो गुज़र गयी सो गुज़र गयी – बशीर बद्र