मजरूह सुल्तानपुरी शायरी – अब सोचते हैं लाएँगे तुझ

अब सोचते हैं लाएँगे तुझ सा कहाँ से हम
उठने को उठ तो आए तिरे आस्ताँ से हम – मजरूह सुल्तानपुरी