शाद अज़ीमाबादी शायरी – अब भी इक उम्र पे

अब भी इक उम्र पे जीने का न अंदाज़ आया
ज़िंदगी छोड़ दे पीछा मिरा मैं बाज़ आया – शाद अज़ीमाबादी