हसरत मोहानी शायरी – दावा-ए-आशिक़ी है तो ‘हसरत’ करो

दावा-ए-आशिक़ी है तो ‘हसरत’ करो निबाह
ये क्या के इब्तिदा ही में घबरा के रह गए – हसरत मोहानी