ज़फ़र इक़बाल शायरी – शहर में क्यूँ मेरी पहचान

शहर में क्यूँ मेरी पहचान ही बाक़ी न रही
इस ख़राबे को तो आबाद भी ख़ुद मैं ने किया – ज़फ़र इक़बाल