ज़फ़र इक़बाल शायरी – सुना करो सुब्ह ओ शाम

सुना करो सुब्ह ओ शाम कड़वी कसीली बातें
कि अब यही ज़ाइक़े ज़बानों में रह गए हैं – ज़फ़र इक़बाल