फिराक गोरखपुरी शायरी – बदगुमाँ होके मिल ए दोस्त

बदगुमाँ होके मिल ए दोस्त जो मिलना है तझे..
यूँ झिझकते हुए मिलना कोई मिलना भी नहीं… – फिराक गोरखपुरी