मिर्ज़ा ग़ालिब शायरी – बस-कि दुश्वार है हर काम

बस-कि दुश्वार है हर काम का आसाँ होना,
आदमी को भी मयस्सर नहीं इंसाँ होना…!! – मिर्ज़ा ग़ालिब