अहमद फ़राज़ शायरी – गुफ़्तगू अच्छी लगी ज़ोक ए

गुफ़्तगू अच्छी लगी ज़ोक ए नज़र अच्छा लगा,,
मुद्दतों के बाद कोई हम सफ़र अच्छा लगा.. – अहमद फ़राज़

मिर्ज़ा ग़ालिब शायरी – मैं और बज़्म-ए-मय से यूँ

मैं और बज़्म-ए-मय से यूँ तिश्ना-काम आऊँ
गर मैं ने की थी तौबा साक़ी को क्या हुआ था – मिर्ज़ा ग़ालिब

मिर्ज़ा ग़ालिब शायरी – मैं ने चाहा था कि

मैं ने चाहा था कि अंदोह-ए-वफ़ा से छूटूँ
वो सितमगर मिरे मरने पे भी राज़ी न हुआ – मिर्ज़ा ग़ालिब

मिर्ज़ा ग़ालिब शायरी – न था कुछ तो खुदा

न था कुछ तो, खुदा था, कुछ न होता तो खुदा होता
डुबोया मुझको होने ने, न होता मैं तो क्या होता…। – मिर्ज़ा ग़ालिब

मिर्ज़ा ग़ालिब शायरी – हम वहाँ हैं जहाँ से

हम वहाँ हैं जहाँ से हम को भी
कुछ हमारी ख़बर नहीं आती – मिर्ज़ा ग़ालिब

मिर्ज़ा ग़ालिब शायरी – दिल ही तो है न

दिल ही तो है न संग-ओ-ख़िश्त दर्द से भर न आए क्यूँ
रोएँगे हम हज़ार बार कोई हमें सताए क्यूँ – मिर्ज़ा ग़ालिब