हसरत मोहानी शायरी – क़िस्सा-ए-ग़म न कहूँगा ‘हसरत’

क़िस्सा-ए-ग़म न कहूँगा ‘हसरत’
जौर की उन के शिकायत होगी! – हसरत मोहानी