मिर्ज़ा ग़ालिब शायरी – उन्हें मंजूर अप‌ने जख्मीयों का

उन्हें मंजूर अप‌ने जख्मीयों का देख आना था
उठे थे सैर-ए गुल को देखना शोख़ी बहाने की – मिर्ज़ा ग़ालिब