मिर्ज़ा ग़ालिब शायरी – निकलना ख़ुल्द से आदम का

निकलना ख़ुल्द से आदम का सुनते आए हैं लेकिन
बहुत बे-आबरू हो कर तिरे कूचे से हम निकले! – मिर्ज़ा ग़ालिब