क़ाबिल अजमेरी शायरी – हमने उसके लब-ओ-रुख़्सार को छूकर

हमने उसके लब-ओ-रुख़्सार को छूकर देखा
हौसले आग को गुलज़ार बना देते हैं – क़ाबिल अजमेरी