मजरूह सुल्तानपुरी शायरी – ग़म-ए-हयात ने आवारा कर दिया

ग़म-ए-हयात ने आवारा कर दिया वरना,
थी आरज़ू तेरे दर पे सुबह-ओ-शाम करें. – मजरूह सुल्तानपुरी

मजरूह सुल्तानपुरी शायरी – शब-ए-इंतिज़ार की कश्मकश में न

शब-ए-इंतिज़ार की कश्मकश में न पूछ कैसे सहर हुई
कभी इक चराग़ जला दिया कभी इक चराग़ बुझा दिया – मजरूह सुल्तानपुरी

मजरूह सुल्तानपुरी शायरी – बचा लिया मुझे तूफ़ाँ की

बचा लिया मुझे तूफ़ाँ की मौज ने वर्ना
किनारे वाले सफ़ीना मेरा डुबो देते – मजरूह सुल्तानपुरी

मजरूह सुल्तानपुरी शायरी – जफ़ा के ज़िक्र पे तुम

जफ़ा के ज़िक्र पे तुम क्यूँ सँभल के बैठ गए
तुम्हारी बात नहीं बात है ज़माने की – मजरूह सुल्तानपुरी

मजरूह सुल्तानपुरी शायरी – ये सच है जीना था

ये सच है जीना था पाप तुम बिन,
ये पाप मैने किया है अब तक,
मगर है मन में छवि तुम्हारी,
के जैसे मंदिर में लौ दिये की! – मजरूह सुल्तानपुरी